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"कसक"

"कसक"


जब बेच कर ईमान कोई चला होगा
क्या उसका अंतर्मन रोया होगा
क्या उठी होगी मन में कोई कसक
क्या दिल का दरिया न पिघला होगा
जब करके गुनाह कोई चला होगा ।

लूट के आबरू किसी की 
क्या कोई चैन से सोया होगा
क्या उसका अंतर्मन रोया होगा
क्या उठी होगी मन में कोई कसक
जब करके गुनाह कोई चला होगा ।

करके शिकार मासूमियत का
क्या कोई बेखौफ न घुमा होगा
क्या उसका अंतर्मन डरा होगा
क्या उठी होगी मन में कोई कसक
जब करके गुनाह कोई चला होगा ।

उछाल के कीचड़ किसी की मर्यादा पर
क्या कोई खुल के न जिया होगा 
क्या उसका अंतर्मन मैला हुआ होगा
क्या उठी होगी मन में कोई कसक
जब करके गुनाह कोई चला होगा ।

गुनाहगार तो 













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